Page 21 - MS Hindi Patrika
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दीवार पर टंगी घडी की कहानी
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म एक घडी ह ँ। हा, वही — जो तुम्हार घर की बैठक की दीवार पर वर्ों स टंगी ह ँ। तुम रोज़ मरी ओर देखते हो, कभी
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ध्र्ान से, कभी बस र्ू ही — जस म वहा न होकर भी वहा ह ँ। पर क्र्ा कभी तुमने मरी कहानी सुनी है?
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मैं इस घर में तब लाई गई थी, जब र्ह नर्ा-नर्ा बना था। मरी चमकती हुई सूइर्ा, सुनहरी बॉडर और तेज़ लटक-लटक
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सबकी नज़रों का कद्र बन गई थीं। सब कहते थे — "क्र्ा सुंदर घडी है!" म गवय स दीवार पर लटकती थी और समर्
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को आगे बढते देखती थी।
मने बहुत क ुछ देखा है — इस घर की सुबहें, दोपहर, शाम और गहरी रातें। मने बच्चों की लकलकाररर्ा सुनी हैं, माँ की
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लोरी क बोल महसूस लकए हैं, और लपता की लचंताओं को चुपचाप समझा है। म हर त्र्ोहार, हर खुशी और हर दुख की
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साक्षी रही ह ँ।
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जब घर म पहला बच्चा पैदा हुआ, तो मने देखा लक कस हर कोई उसक समर् पर दूध लपलाने, सुलाने और खेलने की
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घडी देखकर र्ोजना बनाता था। स्क ूल क पहले लदन, वह बच्चा बार-बार मेरी ओर देखता रहा — "कहीं देर न हो
जाए!"
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लफर धीर-धीर समर् बदलता गर्ा। मेरी बैटरी कई बार बदली गई, मरी सूइर्ा कई बार साफ़ की गई ं , पर मेरा काम वही
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रहा — हर पल को नापना, हर क्षण को लगनना, चुपचाप। म कभी नहीं रुकी, भले ही लकसी ने मेरी ओर ध्र्ान न लदर्ा।
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अब मेरी चमक फीकी हो गई है। मेरी आवाज़ धीमी हो गई है, पर म अभी भी चल रही ह ँ। म जानती ह ँ, कोई मुझस े
बात नहीं करता, कोई मेरी ओर प्र्ार से नहीं देखता, पर म अब भी हर सुबह तुम्हें समर् पर उठाने की कोलशश करती
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ह ँ, हर शाम तुम्हें र्ह बताने का प्रर्ास करती ह ँ लक लदन कसा बीता।
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म दीवार पर टंगी एक साधारण घडी नहीं ह ँ। म इस घर की र्ादों की पहरदार ह ँ, समर् की गवाह ह ँ, और उन तमाम
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पलों की साथी ह ँ, लजन्हें तुमने लजर्ा — और लफर भुला लदर्ा।
समर् चलता रहता है,
पर म उस थाम खडी ह ँ —
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तुम्हारी दीवार पर, तुम्हारी नज़रों क सामने —
मौन, पर जीलवत।
वंश शमा य
VII ब

