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दीवार पर टंगी घडी की कहानी


                              ँ
                                             े
                                                                                      े
                  ैं
                                                                        े
                 म एक घडी ह ँ। हा, वही — जो तुम्हार घर की बैठक की दीवार पर वर्ों स टंगी ह ँ। तुम रोज़ मरी ओर देखते हो, कभी
                                        ै
                                 ँ
                                                            ँ
                                                                               े
                                               ँ
                                          े
                                            ैं
                 ध्र्ान से, कभी बस र्ू ही — जस म वहा न होकर भी वहा ह ँ। पर क्र्ा कभी तुमने मरी कहानी सुनी है?
                                                              े
                                                                             ँ
                                                                                        य
                 मैं इस घर में तब लाई गई थी, जब र्ह नर्ा-नर्ा बना था। मरी चमकती हुई सूइर्ा, सुनहरी बॉडर और तेज़ लटक-लटक
                               ें
                 सबकी नज़रों का कद्र बन गई थीं। सब कहते थे — "क्र्ा सुंदर घडी है!" म गवय स दीवार पर लटकती थी और समर्
                                                                         ैं
                                                                              े
                 को आगे बढते देखती थी।
                 मने बहुत क ुछ देखा है — इस घर की सुबहें, दोपहर, शाम और गहरी रातें। मने बच्चों की लकलकाररर्ा सुनी हैं, माँ की
                                                       ें
                                                                                            ँ
                                                           ें
                                                                         ैं
                  ैं
                 लोरी क बोल महसूस लकए हैं, और लपता की लचंताओं को चुपचाप समझा है। म हर त्र्ोहार, हर खुशी और हर दुख की
                      े
                                                                           ैं
                 साक्षी रही ह ँ।
                                               ैं
                 जब घर म पहला बच्चा पैदा हुआ, तो मने देखा लक कस हर कोई उसक समर् पर दूध लपलाने, सुलाने और खेलने की
                                                                      े
                         ें
                                                           े
                                                         ै
                                                े
                 घडी देखकर र्ोजना बनाता था। स्क ूल क पहले लदन, वह बच्चा बार-बार मेरी ओर देखता रहा — "कहीं देर न हो
                 जाए!"
                           े
                                                                   े
                 लफर धीर-धीर समर् बदलता गर्ा। मेरी बैटरी कई बार बदली गई, मरी सूइर्ा कई बार साफ़ की गई ं , पर मेरा काम वही
                       े
                                                                         ँ
                                                             ैं
                 रहा — हर पल को नापना, हर क्षण को लगनना, चुपचाप। म कभी नहीं रुकी, भले ही लकसी ने मेरी ओर ध्र्ान न लदर्ा।
                                                                                       ैं
                                                                    ैं
                 अब मेरी चमक फीकी हो गई है। मेरी आवाज़ धीमी हो गई है, पर म अभी भी चल रही ह ँ। म जानती ह ँ, कोई मुझस  े
                 बात नहीं करता, कोई मेरी ओर प्र्ार से नहीं देखता, पर म अब भी हर सुबह तुम्हें समर् पर उठाने की कोलशश करती
                                                            ैं
                 ह ँ, हर शाम तुम्हें र्ह बताने का प्रर्ास करती ह ँ लक लदन कसा बीता।
                                                            ै

                 म दीवार पर टंगी एक साधारण घडी नहीं ह ँ। म इस घर की र्ादों की पहरदार ह ँ, समर् की गवाह ह ँ, और उन तमाम
                                                    ैं
                                                                        े
                  ैं
                 पलों की साथी ह ँ, लजन्हें तुमने लजर्ा — और लफर भुला लदर्ा।

                 समर् चलता रहता है,


                 पर म उस थाम खडी ह ँ —
                     ैं
                        े
                            े
                                           े
                 तुम्हारी दीवार पर, तुम्हारी नज़रों क सामने —
                             मौन, पर जीलवत।


                                                                                       वंश शमा  य
                                                                                        VII ब
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