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मेरी वैन



                 मरा वाहन प्रलतलदन मुझ घर स लवद्यालर् तथा लवद्यालर् स घर सुरलक्षत पहुँचाता है। र्ह मर दैलनक जीवन का एक
                                                                                      े
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                 अत्र्ंत आवश्र्क अंग बन गर्ा है। म लजस वाहन स लवद्यालर् जाता ह ँ, वह एक लवद्यालर् वैन है। र्ह वैन पीले रंग
                                                े
                                                                           े
                                                                                      य
                 की, स्वच्छ, सुसलज्जजत तथा सुचारु ऱूप स चलने वाली है। इसम लगभग दस स बारह लवद्यालथर्ों क बैठने की सुलवधा
                                                                ें
                                                                                          े
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                                                       ें
                 है। इसकी सीट आरामदार्क हैं और गमी क लदनों म पंखे चलते हैं, लजसस र्ािा सुखद अनुभव होती है।
                            ैं
                                                                                                    े
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                 प्रत्र्ेक प्रातः म लवद्यालर् क ललए तैर्ार होकर अपने बैग क साथ वैन की प्रतीक्षा करता ह ँ। वैन लनर्त समर् पर मर घर
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                 क सामने आ जाती है। इस चलाने वाले चालक अंकल अत्र्ंत सज्जजन, अनुभवी और उत्तरदार्ी व्र्लि हैं। वे सभी
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                 लवद्यालथर्ों का ध्र्ान रखते हैं और सदा लनर्मों का पालन करते हुए वाहन चलाते हैं। वैन म बैठते ही मर सहपालठर्ों स  े
                                                                                    ें
                                                                                            े
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                 भेंट होती है, और हम मागय भर हँसी-मज़ाक करते हुए लवद्यालर् पहुँचते हैं।
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                                                                         े
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                 रास्ते में अनेक मनोरम दृश्र् देखने को लमलते हैं – सडकों क लकनार खड हर-भर वृक्ष, खेतों में कार्यरत लकसान, खेलते
                                                                            े
                 हुए बच्चे तथा चलती हुई अन्र् गालडर्ा। कभी-कभी वर्ा क समर् रास्ता और भी रमणीर् प्रतीत होता है। वैन में बैठकर
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                                              ँ
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                 र्ािा करना मर ललए आनंद का लवर्र् है।
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                                                                                ें
                                                       ें
                 लवद्यालर् स अवकाश होने क पिात् वही वैन हम लेने आती है। चालक अंकल हम पहचानते हैं और र्ह सुलनलित
                                       े
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                 करते हैं लक कोई भी लवद्याथी पीछ न रह जाए। घर लौटते समर् हम प्रार्ः थक जाते हैं, परंतु वैन म बैठते ही लवश्राम का
                                                                                               े
                                                                                      य
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                                      ें
                 अनुभव होता है। हम मागय म लदनभर की घटनाओं पर चचा करते हैं। वैन क्रमशः सभी लवद्यालथर्ों को उनक घर छोडती
                                      े
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                 है और अंत म मुझ मर घर क सामने उतारती है।
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                 मेरा वाहन मेर ललए कवल एक र्ातार्ात का साधन नहीं, अलपतु एक सच्चा और लवश्वसनीर् साथी है। इसकी सहार्ता
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                                                                          ैं
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                 स म प्रलतलदन समर् पर लवद्यालर् पहुँचता ह ँ और सुरलक्षत घर लौटता ह ँ। म अपने वाहन का आभारी ह ँ और सदैव
                 उसकी स्वच्छता और देखभाल का ध्र्ान रखता ह ँ। प्रत्र्ेक व्र्लि को अपने वाहन क प्रलत आदर का भाव रखना
                                                                                  े
                 चालहए, क्र्ोंलक र्ह हमार जीवन को सरल, सुरलक्षत और सुलवधापूण बनाता है।
                                                                   य
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                 मुझ गवय है लक मर पास ऐसा वाहन है जो मुझ प्रलतलदन लवद्यालर् ले जाता है और मुझ सुखद, सुरलक्षत तथा समर्बि
                                                   े
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                 र्ािा का अनुभव कराता है।
                                                              हलर्यत ठाकरान
                                                                VII स
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