Page 22 - MS Hindi Patrika
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स्क ू ल का खाली मदान मुझसे क्र्ा कहता है..?
                                                       ै

                                        जब म अकला होता ह ँ, और स्क ूल की घंलटर्ा बजना बंद हो जाती हैं, तब मैं अक्सर लखडकी से
                                       े
                                   ैं
                                                                  ँ
                                                                                                  े
                                                                                               ैं
                 बाहर देखता ह ँ — उस खाली मैदान की ओर, जो अब शांलत स सोर्ा हुआ लगता है। पर हर बार जब म उस देखता
                                                                 े
                                े
                              ै
                                       े
                 ह ँ, तो लगता है जस वह मुझस क ुछ कह रहा हो — बहुत क ुछ, जो शधदों से नहीं, बलकक एहसासों से भरा होता है।
                                                                        े
                                                     े
                                                                                                 ें
                                 ें
                 वह मैदान, जो लदन म बच्चों की लकलकाररर्ों स गूंजता है, अब चुपचाप मरी ओर देखता है। पर उस चुप्पी म भी एक
                                                              े
                                                       े
                                                      ै
                 आवाज़ होती है — नमी भरी, र्ादों से ललपटी, जस वह मुझ कह रहा हो,
                                     ँ
                 "मुझ तुम्हारी दौडती हुई सासों की कमी खलती है।"
                     े
                        े
                 वह मुझस कहता है —
                 "कहाँ गए वे पैर, जो लबना रुक मुझ पर भागते थ?
                                                     े
                                       े
                 कहाँ गई वह गेंद, जो मुझ पर उछलती थी?

                               ें
                 और वह मुस्क ुराहट, जो हर खेल की जीत-हार से पर थीं —
                                                        े
                                          े
                 क्र्ा वे सब छुट्टी क साथ ही मुझस भी लवदा हो गई ं ?"
                               े
                               े
                        ै
                 खाली मदान मुझस लशकार्त नहीं करता, पर उसकी नज़र बहुत क ुछ कहती हैं। वह र्ाद करता है वो लुका-लछपी, वो
                                                            ें
                 कबड्डी की टक्कर, वो लक्रकट की चौक-छक्क, और कभी-कभी वो छोटी-मोटी लडाइर्ाँ जो दोस्ती में बदल जाती
                                                    े
                                               े
                                       े
                               ें
                 थीं।
                 एक लदन जब बाररश हो रही थी, मैंने देखा — मैदान भीग रहा था, लेलकन जैसे वह रो नहीं रहा था। वह भीगते-भीगते

                                                                                               ँ
                                                    ें
                                                                                      े
                 मुस्क ुरा रहा था। शार्द वह बच्चों की बाररश म भीगने की खुशी र्ाद कर रहा था — लमट्टी स सने जूते, मुह तक आते
                 बाल, और मासूम हँसी की वो बाररश जो बादलों स भी ज़्र्ादा सुक ून देती थी।
                                                       े

                                                         े
                 कभी-कभी जब म उदास होता ह ँ, तो वह मदान मुझस कहता है —
                                                 ै
                              ैं
                                            ैं
                 "आ जाओ, दौडो, लगरो, उठो — म अब भी तुम्हारा इंतज़ार कर रहा ह ँ।"
                     ै
                          े
                                                            े
                 वह मदान कवल लमट्टी और घास का टुकडा नहीं है। वह मरी बचपन की लकताब का एक पन्ना है — लजसमें शधद
                                          े
                 नहीं, अनुभव ललखे हैं। वह मुझस हर लदन कहता है लक जीवन भी एक खेल की तरह है — हारो, जीतो, पर खेलना
                 मत छोडो।


                 और तब म मुस्क ुराता ह ँ, और मन ही मन उस खाली मदान स कहता ह ँ —
                                                               े
                         ैं
                                                          ै
                                  े
                 "तू खाली नहीं है, तू मरी र्ादों स भरा है।"
                                          े
                                                                                      वंलशका मान

                                                                                        VI अ
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