Page 20 - MS Hindi Patrika
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मरी गुलडर्ा मुझसे बात करती है...!
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म जब बहुत छोटा था, तब मा ने मुझ एक प्र्ारी सी गुलडर्ा लाकर दी थी। वह गुलाबी रंग की थी, उसक लंबे-लंबे बाल
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थे और उसकी आँखें झपकती थीं। पहले वह कवल एक लखलौना थी, पर धीर-धीर वह मेरी सबसे अच्छी दोस्त बन
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गई।
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जब कोई मुझ डाटता, तो म अपनी गुलडर्ा स बातें करता। जब म उदास होता, तो वह मुझ चुपचाप देखती रहती, जैस े
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वह समझ रही हो लक मेर मन में क्र्ा चल रहा है। कभी-कभी मुझ सच म लगता है लक मरी गुलडर्ा मुझस बातें करती
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है।
रात को जब सब सो जाते हैं और सारा घर शांत हो जाता है, तब म अपनी गुलडर्ा को पास रखकर उसस धीर-धीर बातें
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करता ह ँ। म उस अपने लदनभर की कहालनर्ा सुनाता ह ँ – स्क ूल की बातें, दोस्तों से झगड, टीचर की तारीफ़, और माँ
की बनाई खीर का स्वाद।
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मरी गुलडर्ा मुझ कभी टोकती नहीं, कभी मरी लशकार्त नहीं करती। वह बस मरी बातें सुनती है और अपनी प्र्ारी
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मुस्कान स मुझ र्ह अहसास लदलाती है लक वह हमशा मर साथ है। कई बार लगता है जस उसकी आँखों म चमक आ
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जाती है, जस वह मर दुख को समझ रही हो।
जब म बीमार पडता ह ँ, तो मा मरी गुलडर्ा को मर पास रख देती हैं। वह चुपचाप बैठी रहती है, जैसे वह भी प्राथयना कर
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रही हो लक मैं जकदी ठीक हो जाऊ।
म जानता ह ँ लक वह कवल एक गुलडर्ा है, एक लखलौना। पर मेर ललए वह एक सच्ची सहेली है – ऐसी सहेली जो कभी
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मेरी बातों से ऊबती नहीं, जो हर भाव में मेर साथ होती है।
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मरी गुलडर्ा मुझस बातें नहीं करती, लफर भी वह सब क ु छ कह देती है – चुपचाप, नज़रों से, मुस्कान स। शार्द सच्चे
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ररश्ते ऐसे ही होते हैं – शधदों क लबना भी गहर और अपने।
ऱूद्र तुर्ीर
VII ब

