Page 23 - MS Hindi Patrika
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बाररश की पहली बूँद की भावनाए
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म ह ँ — बाररश की पहली बूद।
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कई महीनों स म बादलों की गोद म पल रही थी। सूरज की गमी स लछपाई गई थी, हवाओं ने मुझ सभाला था, और
आकाश ने मुझ सहेजा था। म इंतज़ार म थी — उस क्षण क, जब मैं धरती से लमलने उतऱूगी।
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जब मैं नीचे लगरने लगी, तो मेर भीतर एक अजीब-सी हलचल थी। डर भी था और उत्साह भी। मैं सोच रही थी —
"पता नहीं धरती मुझ अपनाएगी र्ा नहीं।"
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जैसे ही मैं ज़मीन की ओर बढी, मैंने देखा — पेड-पौधे मेरी बाट जोह रहे हैं, पलत्तर्ाँ हवा में लथरकने लगीं, लमट्टी से
एक अनोखी सुगंध उठने लगी — जैसे धरती माँ कह रही हो,
"आओ बेटा, तुम्हारा बहुत इंतज़ार लकर्ा है!"
और जैसे ही मैं धरती पर लगरी, मुझ ऐसा लगा जस म लकसी मा की बाहों म समा गई ह ँ। मरी उपलस्थलत ने सूखी लमट्टी
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को नम लकर्ा, पौधों को जीवन लदर्ा, और बच्चों क चेहर पर हँसी लखला दी।
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मैंने देखा —
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बच्चे नंगे पाव दौडते हुए मर साथ खेल रहे हैं,
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लकसान आकाश की ओर देखकर मुस्क ुरा रहा है,
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और मा बालकनी स बाहर देखते हुए कह रही है —
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"लो, अब बरसात आ ही गई!"
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मुझ लगता है, म लसफ एक बूद नहीं ह ँ —
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म उम्मीद ह ँ,
म राहत ह ँ,
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म प्र्ार की पहली छुअन ह ँ।
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मुझ र्ह भी पता है लक म ज़्र्ादा देर नहीं ठहऱूगी। म लमट्टी म समा जाऊगी, लकसी पौधे की जड में लमल जाऊगी, र्ा
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लकसी नन्हे बीज को अंक ुर बना दूँगी। पर मुझ इसका कोई दुःख नहीं। क्र्ोंलक मरा जन्म लसफ लगरने क ललए नहीं, जीवन
देने क ललए हुआ है।
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म पहली बूद ह ँ — पर अपने साथ अनलगनत भावनाए लाती ह ँ।
म लकसी की प्राथना का उत्तर ह ँ, लकसी की कलवता की ककपना, और लकसी मासूम हृदर् की मुस्कान।
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धान्र्ा लिपाठी
III ब

