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द मान स्क ू ल : उन्नलत की ओर



                                                    लवद्यालर् हमारा प्र्ारा

                                                   ज्ञान का सागर, उलजर्ारा
                                                  जहां हर लदन सीख लमलती है

                                               नई उमंग, नर्ा लसललसला चलता है।
                                                                   े
                                                 शुरुआत हुई एक छत क नीचे
                                                 अब इमारतें खडी है बडी-बडी
                                                  कक्षा में अब स्माट बोड है ,
                                                                    य
                                                                य
                                                 लशक्षा में नर्ापन का जोड है ।
                                                  नवीन र्ंिों का आलोक र्हां

                                                 लचंतन की लनत नई धारा बहाए
                                                          े
                                                  क ं प्र्ूटर स संवाद करता मन
                                              सृजनात्मकता को लक्षलतज तक पहुंचाए।
                                                  लशक्षक न कवल पाठ पढाते
                                                           े
                                                                   े
                                        संस्कारों की लौ  एम एस एफ एस क माध्र्म से जगाते।
                                               लववेक, करुणा और लवज्ञान का मेल

                                                 गढते हैं चररि, लवचारों में खेल।
                                                              े
                                               मेरा लवद्यालर् अब कवल भवन नहीं
                                                   र्ह चेतना का प्रवाह है ।

                                                         ें
                                                  हर ई ं ट म स्वप्न अंलकत है ,
                                                हर दीवार पर लवश्वास की राह है ।
                                                  संग प्रर्ोगशाला की दीवार  ें
                                                 ककपनाओं को आकार देती है

                                                  और पुस्तकालर् की शांलत म  ें
                                                 सभ्र्ताओं की पुकार रहती है ।

                                             मेरा लवद्यालर् मेरा गौरव, र्ह मेरी पहचान
                                               लवश्व पटल पर सदा रहे इसका नाम।

                                                         ें
                                                    अंत म म र्ही कह ंगा-
                                                           ैं
                                                     एक लदव्र् प्रकाश का
                                                  लदव्र् हाथों हुआ पदापयण है।
                                                     ज्जर्ोत से ज्जर्ोत सजी

                                                सज गर्ा लवद्यालर् का प्रांगण है
                                                               े
                                                                  े
                                                  लझललमल लसतार सार करते
                                                      आपको वंदन हैं।
                                                   इस लशक्षा महल की नींव

                                                             े
                                         रखने वाले महापुरुर् को मरा शत-शत अलभनंदन है।
                                                                                       ऋलिमान

                                                                                         X ब
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