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लशक्षा में असमानता और फीस का बोझ



                                                                  े
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                 भारत जस लवकासशील देश म लशक्षा सभी क ललए समान ऱूप स सुलभ नहीं है। समाज म आलथक, सामालजक और
                                                                                         य
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                 क्षेिीर् असमानताओं क कारण लशक्षा व्र्वस्था म भी गहरा अंतर देखा जाता है। एक ओर प्राइवेट स्क ूलों म  ें
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                 अत्र्ाधुलनक सुलवधाए हैं, तो दूसरी ओर सरकारी स्क ूलों म बुलनर्ादी सुलवधाओं की भी कमी है।
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                 महंगे लनजी स्क ूलों और कॉलेजों की बढती फीस मध्र्म और लनम्न वगय क पररवारों पर भारी बोझ बन चुकी है। उच्च
                                                                        े
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                 लशक्षा तो कई छािों क ललए एक सपना बनकर रह जाती है। र्ह असमानता न कवल प्रलतभा को दबाती है, बलकक
                 समाज में सामालजक और आलथयक खाई को भी बढाती है।
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                 लशक्षा को एक मौललक अलधकार क ऱूप म सुलनलित करने क ललए सरकार को फीस लनर्ंिण, स्कॉलरलशप र्ोजनाएँ,
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                 और सरकारी संस्थानों की गुणवत्ता सुधारने जस कदम उठाने चालहए। जब हर बच्चा लबना भेदभाव क लशक्षा पाएगा,
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                 तभी सच्चे अथों म देश का लवकास संभव होगा।
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                                                                                        लदव्र्ांशु
                                                                                         X अ



                                अत्र्लधक पाठ्र्क्रम और परीक्षा का दबाव


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                 वतयमान लशक्षा प्रणाली म छािों पर अत्र्लधक पाठ्र्क्रम और परीक्षा का भारी दबाव देखने को लमलता है। स्क ूलों म  ें

                 लकताबों का बोझ, लंबे पाठ्र्क्रम और बार-बार होने वाली परीक्षाएँ बच्चों क मानलसक व शारीररक स्वास््र् पर
                                                                            े
                 नकारात्मक प्रभाव डालती हैं।

                 बच्चों स कवल अच्छ अंक लाने की अपेक्षा की जाती है, लजससे वे रचनात्मकता, खेल-क ूद और अन्र् कौशलों स  े
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                 दूर हो जाते हैं। परीक्षा को सफलता का एकमाि मापदंड मानना भी छािों म तनाव, भर् और आत्मलवश्वास की कमी
                                                                         ें
                 पैदा करता है।


                 इस समस्र्ा का समाधान र्ह है लक पाठ्र्क्रम को संलक्षप्त, व्र्ावहाररक और रोचक बनार्ा जाए। मूकर्ांकन प्रणाली म  ें

                 भी बदलाव लाकर लनरंतर मूकर्ांकन, प्रोजेक्ट आधाररत सीख और मानलसक स्वास््र् पर ध्र्ान देना चालहए।

                                                                                                     ें
                                                                              य
                 जब लशक्षा बोझ नहीं बलकक आनंददार्क अनुभव बनेगी, तभी लवद्याथी अपने संपूण लवकास की ओर अग्रसर हो सकगे।
                                                                                     आलश्वन आजाद

                                                                                         X अ
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