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P. 5

संपादकीर्


                 हर्य का लवर्र् है लक "पररदृश्र्"  हमार लवद्यालर् की
                                             े
                 लहंदी  पलिका  —  का  र्ह  नवीन  संस्करण  आपक
                                                        े
                 समक्ष  प्रस्तुत  लकर्ा  जा  रहा  है।  र्ह  कवल  एक
                                                 े
                                              े
                 सालहलत्र्क संकलन नहीं, बलकक हमार लवद्यालर् की
                 वैचाररक समृलि, भालर्क अलभव्र्लि और रचनात्मक
                 चेतना का साक्षात् प्रमाण है। लवभागाध्र्क्ष (लहंदी एवं
                                ैं
                              ें
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                 संस्कृत) क ऱूप म म इस मंच क माध्र्म स लवद्यालथर्ों
                 क े  सवाांगीण  लवकास  में  भार्ा  और  सालहत्र्  की
                            े
                 भूलमका को रखांलकत करना चाहती ह ँ। आज जब
                 लशक्षा का स्वऱूप तेजी से बदल रहा है, जब लडलजटल
                 माध्र्मों और कृलिम बुलिमत्ता की चचा हर ओर है,
                                               य
                 तब भी मनुष्र् की मूल संवेदनाए, उसकी सोच, उसकी
                                        ँ
                                                े
                 अलभव्र्लि और उसकी आत्मा—भार्ा क लबना
                                                                                              ँ
                 अधूरी हैं। लहंदी और संस्कृत, हमारी समृि सांस्कृलतक परंपराओं की संवाहक भार्ाए हैं। संस्कृत जहा वैलदक ज्ञान,
                                                                                 ँ
                 दशयन और आचार का स्रोत है, वहीं लहंदी आधुलनक र्ुग की सामालजक चेतना और मानवीर् अनुभवों की अलभव्र्लि
                                                      े
                 की सशि भार्ा बन चुकी है। इन दोनों भार्ाओं क अध्र्र्न स लवद्यालथर्ों म न कवल भालर्क दक्षता आती है, बलकक
                                                               े
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                                                                         ें
                                                                      य
                 वे संवेदनशील, लवचारशील और सुसंस्कृत भी बनते हैं।
                                                                                य
                                                                  े
                                                                     े
                                                        े
                 हमार लवभाग का र्ह सतत प्रर्ास रहा है लक कक्षा क पाठ्र्क्रम स पर जाकर लवद्यालथर्ों को भार्ा स जोडने का कार्य
                                                                                            े
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                 लकर्ा जाए — उन्हें लेखन क ललए प्रेररत लकर्ा जाए, संवाद क ललए प्रोत्सालहत लकर्ा जाए, और सबसे बढकर —
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                                                                े
                 उन्हें सोचने और महसूस करने की स्वतंिता दी जाए।
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                 "पररदृश्र्"  ऐस ही प्रर्ासों का सुंदर प्रलतलबंब है। इस अंक म लवद्यालथर्ों की कलवताए, लघुकथाए, लनबंध, र्ािावृत्तांत,
                                                                               ँ
                                                                   य
                                                                     े
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                 संस्मरण और लवचार-लेख शालमल हैं — जो र्ह दशायते हैं लक हमार लवद्याथी न कवल शधदों से खेलना जानते हैं,
                 बलकक लवचारों की गहराई में उतरने का साहस भी रखते हैं। उनकी भार्ा में आत्मा है, सोच में दृलि है, और अलभव्र्लि
                 में सच्चाई। हमें र्ह समझना होगा लक सवाांगीण लवकास कवल अकादलमक उपललधधर्ों तक सीलमत नहीं है। वह तब
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                 पूण होता है जब एक बच्चा स्वर्ं को समझने लगे, समाज को देखने लगे, दूसरों क अनुभवों स क ुछ सीखने लगे, और
                                                                             े
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                 अपने लवचारों को लजम्मदारी क साथ साझा करना सीखे। भार्ा और सालहत्र् इस प्रलक्रर्ा क मूल साधन हैं।
                                                                                    े
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                 हमारा र्ह भी प्रर्ास रहा है लक लवद्यालथयर्ों को समावेशी, सलहष्णु और बहुभालर्क दृलिकोण प्रदान लकर्ा जाए। लहंदी
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                            े
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                 और संस्कृत क अध्र्र्न क माध्र्म स उन्हें लवलवधता म एकता, सहअलस्तत्व और मानवीर् मूकर्ों की लशक्षा दी जा
                 रही है।
                 मैं इस अवसर पर लवद्यालर् प्रशासन, प्रधानाचार्य महोदर्, सहकमी लशक्षकों, अलभभावकों और संपादकीर् दल का
                 हृदर् से आभार व्र्ि करता ह ँ, लजनक सहर्ोग और प्रोत्साहन स र्ह पलिका एक जीवंत पिजात क ऱूप में सामने
                                                                                             े
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                 आई है।
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                 और अंत म, मैं अपने लप्रर् लवद्यालथयर्ों से र्ही कहना चाहता ह ँ - "शधदों से कवल सालहत्र् नहीं बनता, एक सोच बनती
                 है, एक समाज बनता है, और अंततः एक सुंदर भलवष्र् भी बनता है।" लेखन करते रलहए, पढते रलहए, और सबसे
                 बढकर — सोचते रलहए।
                 आप सभी को उज्जज्जवल भलवष्र् की शुभकामनाओं क साथ,
                                                        े

                                                                                    (र्मुना धर लिपाठी)
                                                                                      लवभागाध्र्क्ष
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