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                                  लशक्षा व्र्वस्था म सुधार की आवश्र्कता


                       भारत की लशक्षा व्र्वस्था म लपछले क ुछ वर्ों म कई प्रगलत हुई है, लेलकन आज भी इसमें
                                                        ें
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                       कई सुधारों की आवश्र्कता है। वतयमान लशक्षा प्रणाली अलधकतर रटने पर आधाररत है,

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                      लजससे छािों में सोचने-समझने की क्षमता लवकलसत नहीं हो पाती। इसक अलावा, ग्रामीण

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                           क्षेिों म गुणवत्तापूण लशक्षा की कमी, लशक्षकों की अनुपलधधता और संसाधनों का अभाव भी बडी
                            समस्र्ाएँ हैं।

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                 आज क समर् में लशक्षा को कवल लडग्री प्राप्त करने का माध्र्म न मानकर, जीवन कौशल, नैलतक मूकर्ों और
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                 रोजगारपरक ज्ञान पर आधाररत होना चालहए। पाठ्र्क्रम को व्र्ावहाररक और नवीन तकनीकों क अनुसार अद्यतन
                                                                                          े
                 लकर्ा जाना चालहए।


                 लशक्षकों का प्रलशक्षण, लडलजटल लशक्षा का लवस्तार, और हर वगय क बच्चों तक लशक्षा की पहुँच सुलनलित करना
                                                                     े
                 आवश्र्क है। जब लशक्षा सशि और समावेशी होगी, तभी देश का लवकास और हर व्र्लि का भलवष्र् उज्जज्जवल होगा।

                                                                                      समथ नारार्ण
                                                                                          य
                                                                                         X अ


                                बढता शैक्षलणक दबाव और मानलसक तनाव


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                 आज क समर् म बच्चों पर शक्षलणक सफलता का अत्र्लधक दबाव बढ गर्ा है। अंकों की दौड, प्रलतर्ोगी परीक्षाओं
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                                                                                  े
                 की तैर्ारी, माता-लपता और समाज की अपेक्षाएँ बच्चों को मानलसक तनाव की ओर धकल रही हैं।
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                 र्ह दबाव कवल शैक्षलणक प्रदशयन तक सीलमत नहीं है, बलकक बच्चों की रचनात्मकता, आत्मलवश्वास और मानलसक
                 स्वास््र् को भी प्रभालवत करता है। लगातार पढाई, कोलचंग कक्षाओं का बोझ, और लवश्राम की कमी से बच्चों में

                 लचंता, अवसाद और आत्महत्र्ा की प्रवृलत्त तक देखी जा रही है।

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                 इस समस्र्ा का समाधान कवल अंक आधाररत लशक्षा स हटकर समग्र लवकास को बढावा देने म है। अलभभावकों और
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                 लशक्षकों को चालहए लक वे बच्चों को समझ, उनका मागयदशयन कर और उन पर अनावश्र्क दबाव न डालें।
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                                                                      े
                 स्वस्थ और तनावमुि वातावरण म ही एक बच्चा अपनी पूण क्षमता क साथ आगे बढ सकता है। मानलसक स्वास््र्
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                 का ध्र्ान रखना लशक्षा लजतना ही महत्वपूण है।
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                                                                                         X अ
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