Page 2 - Hindi Magazine
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प्रधानाचार्य जी की लखनी से ...!
र्ह मर ललए अत्र्ंत हर् और गौरव का
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लवर्र् है लक भारतीर् भार्ा लवभाग की
वालर्यक पलिका ‘पररदृश्र्’ का नवीन
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अंक आप सभी क समक्ष प्रस्तुत लकर्ा
जा रहा है। र्ह पलिका हमार लवद्यालर्
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क लवद्यालथयर्ों की सृजनात्मक प्रलतभा,
सालहलत्र्क अलभरुलच तथा बौलिक
चेतना का सुंदर प्रलतलबंब है। ‘पररदृश्र्’
कवल रचनाओं का संकलन नहीं,
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बलकक र्ुवा मन की ककपनाओं,
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संवदनाओं और लवचारों को अलभव्र्लि
देने वाला एक साथयक मंच है।
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लिक्षा का उद्देश्र् कवल ज्ञानाजन अथवा परीक्षा म उत्कृष्ट पररणाम प्राप्त करना नहीं है। सच्ची लिक्षा वह है, जो लवद्यालथयर्ों में
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लववेक, संवेदना, आत्मानुिासन, नैलतक मूकर्ों और सृजनिील लचंतन का लवकास कर। हमारा प्रर्ास सदैव रहा है लक प्रत्र्ेक
लवद्याथी को अपनी अंतलनयलहत प्रलतभा को पहचानने, उसे लनखारने और समाज क लहत में उसका साथयक उपर्ोग करने क ललए
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उलचत अवसर और प्रेरणा प्राप्त हो।
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इसी दृलष्ट का सिि उदाहरण ‘पररदृश्र्’ है। इस अंक म लवद्यालथयर्ों की कलवताए, लेख, लनबंध, संस्मरण, रखालचि तथा लवलवध
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रचनात्मक अलभव्र्लिर्ाँ उनक मन की ककपनािीलता और लवचारों की व्र्ापकता को प्रस्तुत करती हैं। इन रचनाओं म जहाँ
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एक ओर भार्ाओं और सालहत्र् क प्रलत उनका अनुराग लदखाई देता है, वहीं दूसरी ओर व अपने समर्, समाज, प्रकृलत और
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जीवन क प्रलत अपनी संवदनिील दृलष्ट भी व्र्ि करत हैं।
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आज क तीव्र गलत स पररवलतत होत र्ुग म भारतीर् भार्ाओं का संरक्षण, संवधयन और उनक प्रलत सम्मान की भावना लवकलसत
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करना हमारी महत्वपूण लजम्मदारी है। भारतीर् भार्ाए कवल संवाद का माध्र्म नहीं, बलकक हमारी समृि सांस्कृलतक लवरासत,
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जीवन-मूकर्ों, परंपराओं और राष्ट्रीर् चेतना की संवाहक हैं। ऐस म ‘पररदृश्र्’ लवद्यालथयर्ों को भारतीर् भार्ाओं एवं संस्कृलत स े
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जोड़ने क साथ-साथ स्वतंि लचंतन और मौललक अलभव्र्लि क ललए प्रेररत करने का एक सराहनीर् प्रर्ास है।
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इस सालहलत्र्क एवं सृजनात्मक प्रर्ास को साथयक ऱूप देने क ललए म भारतीर् भार्ा लवभाग क समस्त लिक्षकों, संपादकीर्
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सलमलत तथा लवद्यालथयर्ों को हालदयक बधाई देता ह ँ। इस अंक क लनमायण म र्ोगदान देने वाल प्रत्र्ेक व्र्लि का पररश्रम, समपयण
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और उत्साह प्रिंसा क र्ोग्र् है। म अलभभावकों क लनरंतर सहर्ोग और लवश्वास क ललए भी उनका आभार व्र्ि करता ह ँ।
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मुझ लवश्वास है लक ‘पररदृश्र्’ का र्ह अंक पाठकों क ललए ज्ञानवधयक, प्रेरणादार्क और आनंददार्क लसि होगा तथा लवद्यालथयर्ों
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में पढ़ने, सोचने और सृजन करने की प्रवृलि को और अलधक प्रोत्सालहत करगा। इसकी प्रत्र्ेक रचना हमार लवद्यालथयर्ों क उज्जज्जवल
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भलवष्ट्र् की ओर बढ़ते एक सिि कदम का प्रलतलनलधत्व कर- र्ही मेरी कामना है।
ईश्वर से प्राथयना है लक द मान स्क ू ल लनरंतर ज्ञान, संस्कार, अनुिासन और मानवीर् मूकर्ों की ज्जर्ोलत प्रज्जवललत करता रहे तथा
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हमार लवद्याथी अपनी प्रलतभा, चररि और कमयठता से लवद्यालर्, समाज और राष्ट्र का गौरव बढ़ाएँ।
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इन्हीं मंगलकामनाओं क साथ, ‘पररदृश्र्’ क नवीन अंक क सफल प्रकािन हेतु हालदयक िुभकामनाएँ!
(एस श्रीराम)
प्रधानाचार्य

